एक बार फिर वही सवाल, वही बेचैनी और वही गुस्सा।
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को 40 दिन की पैरोल मिल चुकी है। रोहतक की सुनारिया जेल से 15वीं बार बाहर आने की तैयारी है और इस बार भी ठिकाना वही—सिरसा का डेरा। कड़ी सुरक्षा, विशेष इंतजाम और प्रशासन की पूरी मुस्तैदी के बीच एक सजायाफ्ता कैदी फिर खुले आसमान में सांस लेगा। लेकिन सवाल यह नहीं है कि राम रहीम बाहर आएगा या नहीं।
असल सवाल यह है कि क्या कानून सबके लिए एक जैसा है?
2017 से सजा, लेकिन बार-बार राहत
साध्वी यौन उत्पीड़न मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद 2017 से राम रहीम जेल में बंद है। उम्रकैद की सजा काट रहे इस व्यक्ति को अब तक 14 बार पैरोल या फरलो मिल चुकी है और अब 15वीं बार जेल से बाहर आने की अनुमति दी गई है।
साल 2025 में ही वह तीन बार—फरवरी, अप्रैल और अगस्त—जेल से बाहर आ चुका है।
कानून कहता है कि अच्छे आचरण पर पैरोल मिल सकती है, लेकिन इतनी बार, इतनी आसानी से और इतनी लंबी अवधि के लिए?
यही वह बिंदु है, जहां आम जनता का भरोसा डगमगाता है।
आम कैदी की हकीकत
देश की जेलों में लाखों ऐसे कैदी हैं, जिनके परिवार सालों से अदालतों और जेल दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।
.कोई बीमारी में इलाज के लिए तरसता है
.कोई मां की मौत पर आखिरी दर्शन भी नहीं कर पाता
.कोई छोटे अपराध में सालों से बंद है, लेकिन पैरोल का सपना अधूरा
उनके लिए नियम सख्त हैं, प्रक्रियाएं लंबी हैं और सुनवाई अक्सर टलती रहती है। लेकिन जब मामला “खास” का हो, तो फाइलें तेज़ी से चलने लगती हैं।
कोर्ट और सरकार पर फिर उठते सवाल
यह सच है कि पैरोल कानून के दायरे में दी जाती है, लेकिन कानून की आत्मा भी कोई चीज़ होती है।
बार-बार पैरोल देने से यह संदेश जाता है कि
“कुछ लोग सजा काटते भी हैं और नहीं भी।”
विपक्षी दल और सामाजिक संगठन बार-बार सवाल उठा चुके हैं कि क्या चुनावी राजनीति, धार्मिक प्रभाव और वोट बैंक इन फैसलों के पीछे हैं?
सरकारें चुप हैं, कोर्ट आदेशों के दायरे में है, लेकिन न्याय का नैतिक पक्ष कहीं खोता दिख रहा है।

पीड़ित की आवाज़ कहां है?
हर बार जब राम रहीम जेल से बाहर आता है, तो सिर्फ एक व्यक्ति को राहत नहीं मिलती—
बल्कि पीड़िता के जख्म फिर हरे हो जाते हैं।
उस महिला के लिए यह संदेश जाता है कि उसका दर्द, उसकी लड़ाई, उसकी हिम्मत—सबके ऊपर ताकत और प्रभाव भारी हैं।
सवाल सिर्फ राम रहीम का नहीं
यह मामला किसी एक व्यक्ति का नहीं है।
यह सवाल है हमारे न्याय तंत्र, प्रशासन और लोकतंत्र की आत्मा का।
अगर कानून में “आम” और “खास” के लिए अलग-अलग रास्ते हैं,
तो फिर
संविधान की समानता कहां गई?
न्याय का भरोसा कैसे बचेगा?
उस व्यवस्था पर लगा सवालिया निशान है
40 दिन की यह पैरोल सिर्फ एक खबर नहीं है,
यह उस व्यवस्था पर लगा सवालिया निशान है
जिसे जनता “न्याय” कहकर मानती है।
जब तक कानून की तराजू सच में बराबर नहीं होगी,
तब तक हर ऐसी पैरोल
जनता के मन में यही सवाल छोड़ जाएगी—
क्या भारत में सजा भी हैसियत देखकर तय होती है?
