साल 2025 भारतीय राजनीति के लिए सिर्फ एक और कैलेंडर वर्ष नहीं रहा, बल्कि यह साल लोकतंत्र की कसौटी, जनता के धैर्य की परीक्षा और राजनीतिक नैतिकता के सवालों से भरा रहा। सत्ता में बैठे लोगों की उपलब्धियों के दावों और ज़मीन पर आम आदमी की परेशानियों के बीच की खाई इस साल और गहरी होती नज़र आई।

सत्ता की मजबूती बनाम जनता की बेचैनी

2025 में केंद्र और कई राज्यों में सत्ताधारी दलों ने स्थिरता और विकास का दावा किया। बड़े-बड़े मंचों से कहा गया कि देश तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, इंफ्रास्ट्रक्चर बन रहा है, भारत विश्वगुरु बनने की ओर है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह विकास आख़िरी पंक्ति में खड़े इंसान तक पहुँचा?
महंगाई, बेरोज़गारी और शिक्षा-स्वास्थ्य की बदहाल स्थिति ने आम परिवारों की कमर तोड़ दी। युवा हाथों में डिग्री लेकर भी रोज़गार की तलाश में भटकते रहे। गाँवों से शहरों की ओर पलायन 2025 में भी नहीं रुका, बल्कि कई इलाकों में और तेज़ हुआ।

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फाइल फोटो: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

चुनावी राजनीति और वादों की थकान

2025 में कई राज्यों में चुनाव हुए, कहीं उपचुनाव तो कहीं विधानसभा चुनाव की तैयारियाँ। हर बार की तरह वादों की झड़ी लगी—

बेरोज़गारी खत्म होगी
भ्रष्टाचार मिटेगा
किसानों की आमदनी दोगुनी होगी

लेकिन जनता अब सिर्फ सुनने को तैयार नहीं दिखी। कई जगहों पर मतदाता उदासीन दिखे, मतदान प्रतिशत गिरा। यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है, क्योंकि जब जनता को भरोसा नहीं रहता, तब लोकतंत्र खोखला होने लगता है।

विपक्ष की आवाज़ और लोकतंत्र

2025 में विपक्ष ने सरकार से तीखे सवाल पूछे— चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता, एजेंसियों के दुरुपयोग, मीडिया की भूमिका और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहस तेज़ रही। संसद के अंदर और बाहर हंगामे हुए, लेकिन कई अहम मुद्दों पर सार्थक चर्चा की कमी साफ़ दिखी। लोकतंत्र सिर्फ चुनाव जीतने का नाम नहीं, बल्कि सवाल सुनने और जवाब देने की ताक़त का नाम है—और यही ताक़त 2025 की राजनीति में कमज़ोर पड़ती दिखी।

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नेता प्रतिपक्ष लोकसभा राहुल गांधी

मीडिया, सोशल मीडिया और सच की लड़ाई

2025 में राजनीति का एक बड़ा चेहरा सोशल मीडिया बना रहा। ट्रेंड, हैशटैग और वायरल वीडियो ने नैरेटिव तय किया। लेकिन अफ़सोस यह रहा कि कई बार सच से ज़्यादा शोर बिकता रहा। मीडिया का एक हिस्सा सत्ता के बहुत करीब नज़र आया, जबकि जमीनी समस्याएँ हाशिए पर चली गईं। इससे जनता के मन में यह सवाल और गहरा हुआ।

क्या मीडिया अब जनता की नहीं, सत्ता की आवाज़ बनती जा रही है?

जनता के मन की राजनीति,2025 की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना शायद कोई चुनाव या बिल नहीं, बल्कि जनता का बदलता मूड रहा।

लोग अब जाति, धर्म और भावनात्मक नारों से आगे बढ़कर रोज़मर्रा की ज़िंदगी के सवाल पूछ रहे हैं—

नौकरी कहाँ है?

महंगाई कब घटेगी?

बच्चों का भविष्य सुरक्षित है या नहीं?

अगर राजनीति इन सवालों से मुंह मोड़ती रही, तो आने वाले सालों में इसका जवाब जनता अपने तरीके से देगी।

लेकिन रोज़गार, महंगाई, लोकतांत्रिक विश्वास —

ये मुद्दे सत्तासीन पार्टियों की उपलब्धियों की चमक को धुंधला करते हैं।

2025 एक ऐसा साल रहा जिसमें जनता ने सरकारों से सवाल किया, लेकिन जवाबों ने लोगों को पूरी तरह संतुष्ट नहीं किया।

देश का जवान, किसान, दुकानदार — हर कोई पूछता है:

“रिपोर्ट तो अच्छी है, लेकिन हमारी रोटी क्या सस्ती हुई? हमारी नौकरी क्या पक्की हुई?”

ज़िंदगी बेहतर बनाने के लिए काम करे

2025 की राजनीति ने यह साफ़ कर दिया कि सत्ता मजबूत हो सकती है, लेकिन अगर जनता का भरोसा कमजोर हो जाए, तो लोकतंत्र की नींव हिलने लगती है।
आज ज़रूरत है ऐसी राजनीति की जो सिर्फ चुनाव जीतने के लिए नहीं, बल्कि इंसान की ज़िंदगी बेहतर बनाने के लिए काम करे।

क्योंकि अंत में इतिहास यह नहीं पूछता कि किसने कितने भाषण दिए, इतिहास यह पूछता है कि सत्ता में रहते हुए आपने जनता के लिए क्या बदला।

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