अरावली विवाद

अरावली विवाद: सुप्रीम कोर्ट का पूरा मामला क्या है? (Aravali Parvat December-2025 update)

विवाद कहाँ से शुरू हुआ?

अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक फैली हुई है। यह सिर्फ़ पहाड़ नहीं — यह पर्यावरण, जलवायु, भू-जल संरक्षण और जीवविविधता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। 

सरकार ने हाल ही में अरावली की नई परिभाषा जारी की, जिसमें कहा गया कि:

  • केवल 100 मीटर से ऊंची भू-आकृतियों को ही ‘अरावली पहाड़’ माना जाएगा और 500 मीटर के दायरे में दो या दो से अधिक ऐसी ऊँची आकृतियाँ होने पर उन्हें ‘अरावली रेंज’ माना जाएगा।
  •  इसके आधार पर कई इलाकों को अरावली संरक्षण से बाहर किया जा सकता है। 

यह नई परिभाषा बहुत विवादित रही क्योंकि
पर्यावरण विशेषज्ञ कहते हैं कि इससे अरावली का 90% हिस्सा संरक्षण से बाहर हो जाएगा और खनन, निर्माण तथा अन्य गतिविधियों के लिए खुल जाएगा। 

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अरावली विवाद

सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया?

20 नवंबर का फैसला (पहला कदम)

सुप्रीम कोर्ट ने पहले 20 नवंबर, 2025 को केंद्र सरकार की 100 मीटर वाली परिभाषा को मान्यता दी थी और कहा था कि यही वैज्ञानिक आधार होना चाहिए। 

इस फैसले के आधार पर

  • नए खनन पट्टों को रोकने
  • सतत (sustainable) खनन योजना बनाने
  • पर्यावरण संरक्षण उपायों को लागू करने का निर्देश भी दिया गया था। 

लेकिन…

अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसले पर रोक लगा दी!

29 दिसंबर, 2025 का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही 20 नवंबर वाले फैसले पर रोक (stay) लगा दी है और इसे फिलहाल लागू नहीं होने दिया है। 

इसके पीछे मुख्य वजह थी:

फैसला लागू करने से पहले

  • एक निष्पक्ष, स्वतंत्र और विस्तृत रिपोर्ट की ज़रूरत है
    ताकि विशेषज्ञों के विचार, सभी पक्षों के सुझाव, वैज्ञानिक डेटा और पर्यावरणीय प्रभाव को ठीक से समझा जा सके। 
  • कोर्ट ने कहा कि पुराना फैसला तभी लागू होगा जब एक हाई-पावर एक्सपर्ट कमेटी (विशेषज्ञ समिति) की रिपोर्ट सामने आए और वह सबूत-आधारित हो। 

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सुप्रीम कोर्ट ने क्या निर्देश दिए?

कुछ मुख्य निर्देश:

  • केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया गया है और उनसे जवाब मांगा गया है।
  • एक उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति (high powered expert committee) गठित करने का प्रस्ताव दिया गया है।
  • अगली सुनवाई की तारीख — 21 जनवरी, 2026 तय की गई है। 
  • तब तक सन् 20 नवंबर वाला फैसला लागू नहीं होगा और यथास्थिति (existing status) बनी रहेगी। 

पर्यावरण विशेषज्ञों और समाज की प्रतिक्रिया

पर्यावरणविदों, स्थानीय समुदायों और विपक्षी नेताओं का कहना है कि:

  •  केवल ऊँचाई (100 मीटर) के आधार पर अरावली को परिभाषित करना वैज्ञानिक और पर्यावरणीय रूप से गलत है। 
  • इससे छोटे-छोटे पहाड़ जो भूमिगत जल, जंगल, हवा, तापमान और बारिश पर बड़ा असर डालते हैं, संरक्षण से बाहर हो जाएंगे। 
  •  कई लोगों का यह भी कहना है कि इससे खनन और विकास समूहों को फायदा मिलेगा जबकि पर्यावरण को नुकसान होगा। 

अब आगे क्या होगा?

  • 21 जनवरी, 2026 को अगली सुनवाई होगी। 
  • तब ताज़ा रिपोर्ट और विशेषज्ञों की राय के आधार पर कोर्ट फिर फैसला सुनाएगी।
  • इस फैसले से पर्यावरण-संरक्षण और विकास नीति पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा।

संक्षेप में समझें (एक लाइन में)

सुप्रीम कोर्ट ने पहले अरावली को केवल 100 मीटर वाली पहाड़ियों तक सीमित रखने का फैसला किया था, लेकिन अब उसने अपने फैसले पर रोक लगा दी है और कहा है कि पहले वैज्ञानिक रिपोर्ट और विशेषज्ञ सलाह के बाद ही कोई अंतिम निर्णय होगा। 

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Note:

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By: KP

Edited by: KP

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