बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की गर्मी अब हर गांव, कस्बे और चौक-चौराहे पर महसूस की जा रही है। नेताओं के दौरे, रैलियाँ और बयानों ने माहौल को और गरमा दिया है। इस बार चुनावी रणभूमि में सिर्फ जातीय समीकरण ही नहीं, बल्कि रोजगार, पलायन, घुसपैठ और धार्मिक मुद्दों पर भी सियासत तेज़ हो गई है।
बीजेपी (BJP): डबल इंजन सरकार और घुसपैठ का मुद्दा
भाजपा इस बार भी “विकास” और “डबल इंजन सरकार” का नारा दोहराएगी। अमित शाह लगातार कह रहे हैं कि विपक्ष बिहार में घुसपैठ बढ़ाना चाहता है, और अगर कांग्रेस-राजद की सरकार आई तो अवैध प्रवासी बिहार में भर जाएंगे।
साथ ही भाजपा का नया नारा है— “रफ्तार पकड़ चुका बिहार, फिर एक बार NDA सरकार।”
जेडीयू (JDU): नीतीश कुमार का सुशासन और वादों की बौछार
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल ही में युवाओं को लुभाने के लिए शिक्षक भर्ती और अन्य नौकरियों की घोषणाएँ कीं। लेकिन पटना में युवाओं ने इसका विरोध करते हुए कहा कि यह सिर्फ चुनावी जुमला है, क्योंकि नोटिफिकेशन और भर्ती प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं होती। नीतीश बार-बार यह भरोसा भी दिला रहे हैं कि “मैं कहीं नहीं जाऊंगा, NDA के साथ ही रहूंगा।”
राजद (RJD): रोजगार और “बिहार अधिकार यात्रा”
तेजस्वी यादव इस बार रोजगार को सबसे बड़ा हथियार बना रहे हैं। वे बार-बार 10 लाख नौकरियों के वादे को दोहरा रहे हैं।
उनकी “बिहार अधिकार यात्रा” सिर्फ वोट जुटाने के लिए नहीं, बल्कि जनता को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने का दावा कर रही है।
तेजस्वी ने अमित शाह पर हमला बोलते हुए कहा कि—“वे बिहार बेरोजगारी दूर करने नहीं, बल्कि अपने फायदे के लिए आते हैं।”
कांग्रेस: गठबंधन की उम्मीद और युवाओं का सहारा
कांग्रेस इस बार अकेले दम पर शायद ही लड़े। गठबंधन के भरोसे ही मैदान में होगी। शिक्षा, महंगाई और बेरोजगारी इसके मुख्य मुद्दे होंगे। लेकिन जनता का सवाल यही है कि क्या कांग्रेस बिहार में दोबारा खड़ी हो पाएगी?
वामदल और अन्य: किसान-मजदूर और जातीय समीकरण
वामदल इस बार भी किसान-मजदूर और महंगाई को मुद्दा बनाएंगे।
वहीं, चिराग पासवान जैसे नेता खुले तौर पर सीएम पद की दावेदारी का संकेत दे चुके हैं। उन्होंने कहा—“सीट कम हो लेकिन मजबूत होनी चाहिए।”
उपेंद्र कुशवाहा और पप्पू यादव जैसे नेता भी अपनी जातीय पकड़ और क्षेत्रीय मुद्दों पर चुनावी जमीन तलाश रहे हैं।
जनता के असली सवाल
नेताओं के नारे और वादों से इतर जनता अब भी वही पूछ रही है—
रोजगार कब मिलेगा?
पढ़ाई के बाद नौकरी की गारंटी कब होगी?
हर साल की बाढ़ और पलायन से निजात कब?
क्या बिहार का युवा अपने गांव-घर में रहकर सम्मान से जी पाएगा?

किस पार्टी का क्या मुद्दा? (टेबल तुलना)
पार्टी मुख्य चुनावी मुद्दे जनता से वादा / फोकस जनता के मन का सवाल
भाजपा (BJP) विकास, डबल इंजन सरकार, घुसपैठ सड़क, पुल, बिजली, सुरक्षा का भरोसा रोजगार और उद्योग कब आएंगे?
जेडीयू (JDU) नीतीश कुमार की विरासत, सुशासन महिला योजनाएँ, शिक्षक भर्ती, शिक्षा क्या घोषणाएँ सिर्फ चुनावी जुमला हैं?
राजद (RJD) रोजगार, गरीब और किसान की आवाज़ 10 लाख नौकरियों का वादा, अधिकार यात्रा क्या वादा हकीकत बनेगा या जुमला?
कांग्रेस शिक्षा, बेरोजगारी, महंगाई गठबंधन में युवाओं और किसानों पर फोकस क्या कांग्रेस दोबारा खड़ी हो पाएगी?
वामदल मजदूर-किसान की समस्याएँ, महंगाई गरीब वर्ग और श्रमिकों के हक की लड़ाई क्या इनके मुद्दे सुने जाएंगे?
अन्य (चिराग, कुशवाहा, पप्पू यादव) जातीय समीकरण, क्षेत्रीय समस्याएँ सीएम दावेदारी, जातीय समीकरण, क्षेत्रीय पकड़ निर्णायक बनेंगे या वोटकटवा?
ताज़ा झलक: बयानबाज़ी से चुनावी हवा गरमाई
चिराग पासवान ने सीएम पद की दावेदारी पर संकेत देकर हलचल मचा दी।
तेजस्वी यादव ने बेरोजगारी और घुसपैठ को लेकर भाजपा पर तीखा हमला बोला।
अमित शाह ने विपक्ष पर घुसपैठ बढ़ाने का आरोप लगाया।
नीतीश कुमार बार-बार यह भरोसा दिला रहे हैं कि वे NDA के साथ हैं और युवाओं के लिए नौकरियाँ लाएँगे।
बिहार चुनाव 2025 सिर्फ नेताओं की परीक्षा नहीं, बल्कि जनता की भी कसौटी है। इस बार यह तय होगा कि जनता जात-पात और वादों से ऊपर उठकर अपने असली दर्द—रोजगार, शिक्षा और पलायन—को मुद्दा बना पाती है या नहीं।

