बिहार में इस वक्त हालात ऐसे हैं कि लोग घर छोड़कर सड़क पर सोने को मजबूर हैं। गांव-गांव पानी में डूबा है, खेत बर्बाद हो चुके हैं, जानवर भूख से तड़प रहे हैं और इंसान राहत शिविरों के इंतज़ार में हैं। लेकिन राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों ही मानो आंखें मूंदकर बैठी हैं। सवाल ये है कि आखिर कौन सुनेगा बिहार की जनता की पुकार? और सरकारें क्यों नहीं सुन रहीं?
बिहार के कई जिलों में तबाही
इस साल बाढ़ ने बिहार के कई जिलों में तबाही मचाई है। दरभंगा, सीतामढ़ी, कटिहार, मधुबनी, भागलपुर, सुपौल जैसे जिले पानी-पानी हो चुके हैं। आधिकारिक आंकड़े कहते हैं कि लाखों लोग प्रभावित हैं, लेकिन हकीकत तो इससे कहीं ज्यादा दर्दनाक है। कई गांवों में न तो राहत सामग्री पहुंची, न नाव, न ही मेडिकल टीम। लोग अपने दम पर बच्चों, बुजुर्गों और बीमारों को कंधे पर बिठाकर सुरक्षित जगह ले जा रहे हैं।

सबसे बड़ी समस्या है—सरकारी लापरवाही।
चुनाव के समय नेता गांव-गांव जाकर हाथ जोड़ते हैं, लेकिन बाढ़ के समय वही नेता गायब हो जाते हैं। टीवी चैनलों पर बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में ये सिर्फ फोटो खिंचवाने की राजनीति बचती है। राहत फंड की घोषणाएं होती हैं, मगर पैसों के इस्तेमाल और वितरण का कोई साफ रिकॉर्ड ही नहीं होता। और जनता राह देखती ही रह जाती है।
लोग पूछ रहे हैं—हमारे टैक्स का पैसा कहां जा रहा है? बाढ़ तो बिहार में हर साल आती है, फिर भी कोई पुख्ता तैयारी क्यों नहीं होती? क्या सरकार को पता नहीं कि कोसी, गंडक और गंगा के किनारे बसे जिलों में हर साल यही त्रासदी दोहराई जाती है? अगर पता है तो फिर बांध, जल निकासी और राहत सिस्टम मजबूत क्यों नहीं किया गया?
ये सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक और प्रशासनिक विफलता है। बाढ़ से बर्बादी तो होती ही है, लेकिन सरकारों की बेरुखी लोगों के जख्म और गहरे कर देती है।
आज जरूरत है कि सरकारें चुनावी पोस्टर से निकलकर गांवों के कीचड़ में उतरें, राहत सिर्फ कागज पर नहीं बल्कि हर घर तक पहुंचे, और बाढ़ को सिर्फ “आपदा” नहीं बल्कि “स्थायी समस्या” मानकर स्थायी समाधान की दिशा में कदम उठाएं। वरना हर साल यही होगा—बिहार डूबेगा, लोग चीखेंगे, और सरकारें चुप बैठी तमाशा देखेंगी।
