निर्वाचन आयोग द्वारा चलाया जा रहा “विशेष गहन पुनरीक्षण” (SIR) अभियान अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रहा, बल्कि आम नागरिकों के लिए मानसिक यातना बनता जा रहा है। बिहार से शुरू हुआ यह विवाद उत्तर प्रदेश होता हुआ अब पश्चिम बंगाल तक पहुँच चुका है। हर जगह एक जैसी शिकायतें—नाम कट गए, नोटिस नहीं मिला, कारण नहीं बताया गया। कागजों में यह प्रक्रिया मतदाता सूची को “शुद्ध” करने के लिए है, लेकिन ज़मीन पर यह गरीब, प्रवासी, बुज़ुर्ग और हाशिए पर खड़े लोगों को लोकतंत्र से बाहर धकेलती दिख रही है।
बिहार बना विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का प्रयोगशाला, आम जनता बनी शिकार
बिहार में हुए SIR ने पहले ही चेतावनी दे दी थी कि यह कवायद कितनी खतरनाक हो सकती है। ग्रामीण इलाकों में हजारों लोगों को पता ही नहीं चला कि उनका नाम “तार्किक विसंगति सूची” में डाल दिया गया है। कहीं BLO पहुंचे ही नहीं, कहीं लोगों से ऐसे दस्तावेज मांगे गए जो उनके पास कभी थे ही नहीं। प्रवासी मजदूरों के नाम कटे। बाढ़ प्रभावित इलाकों के लोग छूट गए। दलित और महादलित टोले सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए। कई जगह शिकायत आई कि स्थानीय अधिकारियों ने मनमाने ढंग से नाम हटाए और कहा—“ऊपर से आदेश है।” यही सवाल उठता है—क्या यह सिर्फ संयोग है कि असर हमेशा कमजोर तबके पर ही पड़ता है?
जब चुनाव आयोग निष्पक्ष दिखना छोड़ दे
निर्वाचन आयोग को लोकतंत्र का प्रहरी कहा जाता है। लेकिन मौजूदा हालात में उस पर सत्ता पक्ष के इशारों पर काम करने के आरोप तेज होते जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में साफ कहा कि राज्य के नागरिकों के अधिकारों का हनन हो रहा है। दावा है कि केवल नाम, उम्र या उपनाम की मामूली गलती के आधार पर 1.36 करोड़ लोगों को नोटिस थमा दिए गए। सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा कि—
“यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी पात्र नागरिक मताधिकार से वंचित न रहे।” सोचने वाली बात यह है कि जो काम चुनाव आयोग को खुद करना चाहिए था, उसके लिए अदालत को दखल क्यों देना पड़ रहा है?
बांग्ला उच्चारण से लेकर बिहार की गरीबी तक—गलती हमेशा जनता की?
शीर्ष अदालत ने यहां तक कहा कि बांग्ला बोलचाल में नामों की वर्तनी बदल जाती है। लेकिन क्या यही “तार्किक विसंगति” है?
बिहार में लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं। कहीं पिता का नाम अलग लिखा गया, कहीं उम्र दो साल आगे-पीछे हो गई। क्या इसका मतलब यह हुआ कि वे वोट देने लायक ही नहीं रहे?
लोकतंत्र में दस्तावेज नहीं, नागरिकता अहम होती है।
इतिहास गवाह है—जब मुख्यमंत्री जनता के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुँचा
भारत के राजनीतिक इतिहास में ऐसे मौके दुर्लभ हैं, जब कोई मुख्यमंत्री सीधे जनता के अधिकारों के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुँचा हो। 1970–80 के दशक में सामाजिक न्याय और नागरिक अधिकारों को लेकर कई राज्य सरकारें केंद्र से टकराईं। बाद के वर्षों में भी कुछ मुख्यमंत्रियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया—लेकिन हमेशा सत्ता के खिलाफ खड़ा होना आसान नहीं होता। आज पश्चिम बंगाल सरकार का सुप्रीम कोर्ट जाना इसी परंपरा की याद दिलाता है—जब राज्य सत्ता से नहीं, जनता से जुड़ा रहता है। और तो ओर जब पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से बड़े बड़े वकील रहने के बाद भी जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जनता की वकील बन जाये तो समझ जाना चाहिए कि गड़बड़ झाला कुछ ज्यादा हिभाई और आज़ाद भारत में कभी कोई खुद अपना पक्ष रखा हो शायद कोई मुख्यमंत्री तो नहीं ।

लोकतंत्र की आत्मा मतदाता है, सूची नहीं
मतदाता सूची महत्वपूर्ण है, लेकिन मतदाता उससे कहीं ज्यादा। अगर एक भी योग्य नागरिक वोट देने से वंचित होता है, तो यह सिर्फ प्रशासनिक गलती नहीं—लोकतंत्र पर चोट है। आज जरूरत है कि—हर हटाए गए नाम का स्पष्ट कारण सार्वजनिक हो प्रभावित व्यक्ति को समय पर सूचना मिले
पात्रता साबित करने का आसान रास्ता दिया जाए
पूरी प्रक्रिया स्वतंत्र निगरानी में हो
वरना SIR इतिहास में “Special Intensive Revision” नहीं, “Systematic Invisible Removal” के नाम से दर्ज होगा।
आख़िरी सवाल
जब चुनाव आयोग पर जनता का भरोसा डगमगाने लगे,
जब अदालत को हस्तक्षेप करना पड़े,
जब करोड़ों लोग अपने वोट को लेकर आशंकित हों—
तो यह सिर्फ प्रशासनिक संकट नहीं, लोकतांत्रिक चेतावनी है।
आज सवाल यह नहीं है कि सूची कितनी शुद्ध हुई,
सवाल यह है कि कितने नागरिक लोकतंत्र से बाहर कर दिए गए।
