बिहार की राजनीति ने एक बार फिर वही तस्वीर दोहरा दी है। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने हुए हैं और केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार है। यानी राज्य और केंद्र—दोनों जगह सत्ता का तालमेल फिर से मौजूद है। सवाल यह नहीं है कि सरकार बनी या नहीं, असली सवाल यह है कि 20 वर्षों से सत्ता में रहने के बाद भी क्या बिहार का सबसे बड़ा जख्म—पलायन और बेरोज़गारी—भर पाएगा?

बिहार में 20 साल की सत्ता, फिर भी वही सवाल

नीतीश कुमार 2005 से लेकर अब तक अलग-अलग राजनीतिक गठबंधनों के साथ बिहार की सत्ता में रहे हैं , इस दौरान लगभग 90% NDA के साथ ही रहे है। इस दौरान सड़कों का निर्माण हुआ, कानून-व्यवस्था में पहले के मुकाबले सुधार हुआ, शराबबंदी जैसे फैसले लिए गए। लेकिन अगर हम आम बिहारी की ज़िंदगी को देखें, तो एक सच्चाई आज भी चुभती है—रोज़गार के लिए बिहार का युवा आज भी दिल्ली, मुंबई, सूरत, पंजाब और बेंगलुरु की ट्रेनों में धक्के खा रहा है।

सरकार
फाइल फोटो: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सीएम नीतीश कुमार

बिहार में पलायन: मजबूरी या विकल्प?

सरकारी आंकड़ों और विभिन्न सामाजिक-आर्थिक रिपोर्टों के मुताबिक, बिहार देश के उन राज्यों में है जहां से सबसे ज्यादा श्रमिक पलायन करते हैं। गांव का युवा खेती छोड़कर ईंट-भट्ठों, फैक्ट्रियों, निर्माण स्थलों और होटल-ढाबों में काम करने को मजबूर है। हर त्योहार पर ट्रेनें भर जाती हैं, प्लेटफॉर्म पर भीड़ होती है, और कैमरों में फिर वही तस्वीर कैद होती है—“बिहार से बाहर जाते मजदूर”। यह सवाल आज भी जस का तस है— अगर विकास हुआ है, तो बिहार का युवा घर छोड़कर क्यों जा रहा है?

बेरोज़गारी: डिग्री है, नौकरी नहीं

बिहार में पढ़े-लिखे युवाओं की कमी नहीं है। बीए, एमए, बीटेक, एमटेक, आईटीआई—डिग्रियों की भरमार है, लेकिन नौकरी के नाम पर सरकारी भर्तियों में देरी, पेपर लीक, और सीमित अवसर। सरकारी नौकरी की तैयारी करते-करते युवा उम्र की सीमा पार कर जाता है। निजी क्षेत्र में उद्योगों की कमी के कारण विकल्प बेहद सीमित हैं।

भावनात्मक सच्चाई यह है कि—एक पिता और मां अपने बेटे को पढ़ाने के लिए कर्ज लेते है, लेकिन वही बेटा बाद में दूसरे राज्य में दिहाड़ी मजदूर बन जाता है।

केंद्र-राज्य में एक ही गठबंधन: मौका या बहाना?

अब जब बिहार में नीतीश कुमार और केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार है, तो अक्सर कहा जाता है कि “डबल इंजन की सरकार” से विकास तेज़ होगा।

लेकिन जनता पूछ रही है— अगर 11 साल से केंद्र में बीजेपी और 20 साल से राज्य में नीतीश कुमार हैं, तो अब तक बड़े उद्योग क्यों नहीं आए?

फूड प्रोसेसिंग, टेक्सटाइल, आईटी पार्क, मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स—ये सब कागजों में ही क्यों सीमित हैं?

जमीनी हकीकत बनाम सरकारी दावे

सरकार आंकड़ों में रोजगार सृजन, स्टार्टअप नीति और स्किल डेवलपमेंट की बात करती है। मगर गांव-गांव में आज भी हालात वही हैं— खेतों में काम कम,स्थानीय फैक्ट्रियां न के बराबर, ठेका प्रथा और अस्थायी रोजगार,मजदूरी कम

महंगाई ज्यादा युवा पूछता है:

“हम बिहार में रहकर क्या करें?”
उम्मीद अब भी बाकी है, लेकिन वक्त कम है
बिहार की जनता ने फिर से भरोसा दिया है। यह भरोसा आखिरी भी हो सकता है। अब बहाने नहीं, ठोस नतीजे चाहिए। जरूरत है—स्थानीय स्तर पर उद्योग लगाने की
खनन, कृषि और लघु उद्योगों में स्थानीय लोगों को रोजगार देने की ,सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता और समयबद्ध प्रक्रिया की,पलायन रोकने के लिए गांव-कस्बों में काम के अवसर पैदा करने की

इसका निष्कर्ष

20 साल की सत्ता के बाद भी अगर सवाल वही हैं, तो आत्ममंथन जरूरी है।
बिहार को भाषण नहीं, रोजगार चाहिए।
बिहार को आंकड़े नहीं, सम्मानजनक काम चाहिए।

अगर इस बार भी पलायन और बेरोज़गारी नहीं रुकी, तो इतिहास यह जरूर लिखेगा कि मौका बार-बार मिला, लेकिन बिहार का दर्द अनसुना रह गया।

देश दुनिया की खबरों की अपडेट के लिए AVN News पर बने रहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *