नई दिल्ली। सुबह के करीब 10 बजे हैं। सरदार वल्लभभाई पटेल अस्पताल (SVP Hospital) पटेल नगर की ओपीडी के बाहर पहले से ही लंबी कतार लगी है। हाथ में पर्ची लिए मरीज दवा काउंटर की ओर उम्मीद से देखते हैं, लेकिन काउंटर पर पहुंचते ही कई चेहरों की उम्मीद टूट जाती है। जवाब एक ही— “दवा नहीं है, बाहर से ले लीजिए।”
अस्पताल तो सरकारी है, लेकिन खर्च निजी जैसा
SVP अस्पताल में इलाज कराने आए ज्यादातर मरीज गरीब और निम्न आय वर्ग से हैं। कोई दिहाड़ी मजदूर है, कोई रिक्शा चालक, तो कोई दूर-दराज़ से आया बुज़ुर्ग। डॉक्टर जांच के बाद दवा लिख देते हैं, लेकिन अस्पताल में दवा उपलब्ध न होने के कारण मरीजों को मजबूरन बाहर की मेडिकल दुकान का रुख करना पड़ता है।
एक मजदूर मरीज ने बताया, “दिन भर की मजदूरी 400 रुपये है। उसमें से 150 किराया लगा और अब 300 की दवा बाहर से खरीदने को कह रहे हैं। ऐसे में इलाज कराएं या पेट भरें?”

दिल्ली SVP में तीन दिन से भटक रही बुज़ुर्ग महिला
अस्पताल परिसर में बैठी 65 वर्षीय बुज़ुर्ग महिला बताती हैं कि वह पिछले तीन दिनों से दवा के लिए अस्पताल आ रही हैं।
“डॉक्टर कहते हैं दवा ज़रूरी है, लेकिन काउंटर पर हर बार मना कर देते हैं। बाहर से दवा लाने के पैसे नहीं हैं।” उनकी आंखों में बेबसी साफ दिखती है।
दवा काउंटर पर रोज़ का वही जवाब
दवा वितरण काउंटर पर मौजूद कर्मचारी भी असहज नजर आते हैं। उनका कहना है कि कई जरूरी दवाओं का स्टॉक खत्म है। मरीजों की भीड़ बढ़ रही है, लेकिन सप्लाई नहीं आ रही। नतीजा— मरीज नाराज़, कर्मचारी असहाय।
मरीज के परिजन की बेबसी: सरकारी अस्पताल की बदहाली उजागर
दीपक कुमार की बहन को डिलीवरी के लिए सरदार वल्लभ भाई पटेल अस्पताल में भर्ती कराया गया। परिवार को उम्मीद थी कि सरकारी अस्पताल में इलाज के दौरान जरूरी सुविधाएं और दवाइयां उपलब्ध होंगी, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट निकली।
परिजनों के अनुसार, अस्पताल में मौजूद डॉक्टरों ने साफ तौर पर कहा कि सर्जिकल ग्लव्स अस्पताल में उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए उन्हें बाहर मार्केट से खरीदकर लाने को कहा गया। यही नहीं, डिलीवरी से जुड़ी कई आवश्यक दवाएं और बेसिक मेडिकल सामान भी अस्पताल में नहीं मिले, जिन्हें मजबूरी में बाहर से खरीदना पड़ा।
डिलीवरी जैसा संवेदनशील मामला होने के बावजूद अस्पताल की यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। जिस समय एक परिवार मानसिक तनाव और डर से गुजर रहा होता है, उसी समय उन्हें अस्पताल से बाहर दौड़कर जरूरी सामान जुटाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए यह स्थिति और भी दर्दनाक हो जाती है, क्योंकि सरकारी अस्पताल में इलाज कराने का एकमात्र कारण ही आर्थिक मजबूरी होता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के बड़े-बड़े दावे करती है, तो फिर जमीनी हकीकत इतनी अलग क्यों है? अगर अस्पताल में सर्जिकल ग्लव्स जैसी बुनियादी चीजें भी उपलब्ध नहीं हैं, तो आम मरीज और उसके परिजन किस पर भरोसा करें?
दीपक कुमार और उनके परिवार की यह बेबसी केवल एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि यह सरकारी अस्पतालों की उस व्यवस्था की तस्वीर है, जहां मरीज से ज्यादा उसके परिजनों को संघर्ष करना पड़ता है। जरूरत है कि स्वास्थ्य विभाग इस तरह की लापरवाही पर गंभीरता से ध्यान दे, ताकि भविष्य में किसी और परिवार को ऐसी मजबूरी और अपमान का सामना न करना पड़े।
सरकारी दावे और अस्पताल की हकीकत
दिल्ली सरकार बार-बार यह दावा करती है कि सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज और दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। लेकिन SVP जैसे बड़े अस्पताल में दवाओं की कमी इन दावों की पोल खोलती है।
यह सवाल उठना लाज़मी है कि—
क्या दवाओं की सप्लाई समय पर नहीं हो रही?
क्या जिम्मेदार विभाग हालात से अनजान हैं?
या फिर गरीब मरीजों की आवाज़ कहीं दबा दी गई है?
इलाज अधूरा, भरोसा टूटता हुआ
कई मरीज दवा न मिलने की वजह से इलाज बीच में ही छोड़कर लौटने को मजबूर हैं। सरकारी अस्पताल, जो गरीबों की आखिरी उम्मीद माना जाता है, वहीं उन्हें सबसे ज्यादा परेशानी झेलनी पड़ रही है।
SVP अस्पताल की यह स्थिति सिर्फ एक अस्पताल की कहानी नहीं है, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की उस सच्चाई को दिखाती है, जहां योजनाएं और दावे तो हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर गरीब मरीज आज भी संघर्ष कर रहा है।
अब देखना यह है कि दिल्ली सरकार और स्वास्थ्य विभाग इस ओर कब ध्यान देते हैं, क्योंकि दवा के बिना इलाज और भरोसे के बिना व्यवस्था दोनों ही अधूरे हैं।
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