बिहार विधानसभा के पिछले चुनाव में मिली नाकामी और महागठबंधन की हार का विलेन बन जाने से अब सीख लेकर कांग्रेस इस बार चुनावी साल की शुरुआत के साथ ही बिहार की राजनीति में एक्टिव मोड में आ गई है. वही बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष डॉक्टर अखिलेश प्रसाद सिंह से लेकर महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष अलका लांबा और बिहार कांग्रेस के प्रभारी सचिव शाहनवाज आलम तक, सभी मैदान में उतर गए हैं. मैदान में उतरते ही नेतृत्व की कोशिश विधानसभा चुनाव के लिए जमीन तैयार करने के साथ ही ऐसी सीटों को चिह्नित करना भी है जहां पार्टी के जीतने की संभावनाएं ज्यादा मजबूत हों.

बिहार कांग्रेस ने रखा 50 सीटें जीतने का लक्ष्य

बिहार कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद डॉक्टर अखिलेश प्रसाद सिंह ने कहा है कि हमने आने वाले विधानसभा में 50 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है. उन्होंने खुद भी यह स्वीकार किया है कि यह लक्ष्य आसान नहीं है लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि ये नामुमकिन भी नहीं है. अखिलेश प्रसाद ने दावा किया है कि बिहार कांग्रेस के पक्ष में इस बार चौंकाने वाले नतीजे आएंगे.

मिशन 50 के नारे, और अब चौंकाने वाले नतीजों के दावे को सही साबित करना चाहते है तो इनके लिए कांग्रेस पार्टी को सबसे पहले अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना होगा. वही 2020 के चुनाव नतीजों में 70 सीटों पर चुनाव लड़कर महज 27 फीसदी स्ट्राइक रेट के साथ 19 सीटें ही जीत पाई थी, पार्टी को राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) इस बार अधिक सीटें देने का खतरा मोल लेगी? खासकर तब, जब महागठबंधन 110 सीटें जीतकर बहुमत के लिए जरूरी 122 के जादुई आंकड़े से महज 12 सीट से पीछे रह गया था और विपक्षी गठबंधन की मात के लिए कांग्रेस के प्रदर्शन को कसूरवार ठहराया गया था.

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस का प्लान-45

वही मिशन 50 का नारा देने वाली कांग्रेस पार्टी के नेता भी यह समझ रहे हैं कि सीट शेयरिंग की टेबल पर अपनी डिमांड मनवाने की राह में पिछले चुनाव का प्रदर्शन उसकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा रहने वाला है. यही वह वजह है कि पार्टी ने इस बार खास रणनीति बनाई है- प्लान 45. दरअसल, कांग्रेस पार्टी ने 2015 के विधानसभा चुनाव में 41 सीटों पर चुनाव लड़ा था और तब 27 सीटें जीतने में सफल रही थी जो 1995 में 29 सीटों पर जीत के बाद बिहार चुनाव में पार्टी का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था. वही कांग्रेस को इतनी सीटें लड़ने के लिए तब मिली थीं जब महागठबंधन में जेडीयू भी थी. 2020 के चुनाव से पहले कांग्रेस नेतृत्व अधिक सीटों की डिमांड पर अड़ गया था.

वही हां-ना, हां-ना का दौर अंतिम वक्त तक चलता रहा और तब जा कर बात बनी तेजस्वी यादव की राहुल गांधी के साथ हुई बात के बाद. वही लालू यादव की पार्टी ने आखिरकार कांग्रेस को 70 सीटें देने पर हामी भर दी जो 2015 चुनाव के मुकाबले 29 ज्यादा थीं. सीटों की संख्या में कांग्रेस की चल गई लेकिन जब माइक्रो लेवल पर सीटों का आवंटन शुरू हुआ, देश की सबसे पुरानी पार्टी के साथ यहीं पर खेल हो गया था. कांग्रेस को जो सीटें दी गईं, उनमें से 45 ऐसी थीं जहां पार्टी पिछले चार चुनाव से जीत ही नहीं पाई थी. 70 में से 67 सीटों पर 2019 के लोकसभा चुनाव में एनडीए ने लीड किया था.

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बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव और लोक सभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी

आरजेडी ने कांग्रेस की 70 सीटों की डिमांड मान तो ली थी लेकिन ऐसी सीटें दे दी थीं जहां एनडीए का प्रभाव बहुत अधिक था. इससे सीट शेयरिंग में कांग्रेस भले ही आरजेडी के बाद दूसरे सबसे बड़े घटक का टैग हासिल करने में सफल रही हो, नतीजे आए तो पार्टी विलेन बन गई थी. वही इसके उलट, लेफ्ट पार्टियों ने 29 सीटों पर चुनाव लड़ा और 16 सीटें जीतने में सफल रही थीं. वही सीट शेयरिंग में लेफ्ट के हिस्से आई कई सीटें ऐसी थीं जहां परंपरागत रूप से कांग्रेस मजबूत रही है.

वही कांग्रेस के नेता भी जानते हैं कि इस बार आरजेडी 2020 चुनाव के स्ट्राइक रेट को आधार बनाकर ही पार्टी को कम से कम सीटें देना चाहेगी. वही लालू यादव की पार्टी के ऐसे किसी भी दांव से निपटने के लिए कांग्रेस ने पहले से ही होमवर्क में जुट गई है. इसके लिए ही पार्टी ने प्लान-45 बनाया है. वही कांग्रेस का फोकस इस बार सीटों के नंबर पर अधिक जोर लगाने से ज्यादा ऐसी सीटें पाने पर है जहां पार्टी की जमीन अपेक्षाकृत मजबूत है और जीत की संभावनाएं बन सकती हैं.

चुनाव के लिए मैदान में कांग्रेस का नेतृत्व

वही कांग्रेस का नेतृत्व बिहार चुनाव के लिए मैदान में उतर आया है. बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह ने सभी नेताओं के साथ चंपारण की जमीन पर उतर गए हैं. वही महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष अलका लांबा अभी वैशाली में हैं. वही बिहार कांग्रेस के प्रभारी शाहनवाज आलम सीमांचल के पूर्णिया, अररिया और बेगूसराय में हैं. चुनाव में अभी काफी समय बचा है लेकिन पार्टी ने वार रूम के पुनर्गठन की प्रक्रिया भी अब शुरू कर दी है. वही इन सारी कवायदों को अब कांग्रेस चुनावी तैयारी से जोड़ रही है. वही ऐसा ही है भी लेकिन सुस्त इमेज वाली पार्टी का इतना पहले एक्टिव मोड में आ जाना सीट शेयरिंग की टेबल पर जाने से पहले होमवर्क से जुड़ा भी बताया जा रहा है. कांग्रेस नेतृत्व की पूरी कोशिश है कि जमीनी आधार पर जीतने योग्य सीटें चिह्नित की जाएं और फिर उन्हें हासिल करने के लिए जोर लगाया जाए. बाकी, लालू यादव की अगुवाई वाली आरजेडी इस बार कांग्रेस को कितनी और कौन सी सीटें देती है, ये अब देखने वाली बात होगी.

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