एनसीपी (एसपी) के मुखिया शरद पवार (Sharad Pawar) की करीब छह दशक लंबी संसदीय और सियासी यात्रा क्या आगे भी जारी रहेगी? महाराष्ट्र की राज्यसभा सीट को लेकर चल रही हलचल के बीच यह सवाल तेजी से चर्चा में है। संकेत साफ हैं कि महाविकास अघाड़ी (एमवीए) के भीतर उनकी उम्मीदवारी पर सहमति बनती दिखाई दे रही है।
कांग्रेस का समर्थन, शिवसेना (यूबीटी) में मंथन
सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस ने पवार की उम्मीदवारी का समर्थन करने का मन बना लिया है। वहीं अब तक अपना उम्मीदवार उतारने की बात कह रही Shiv Sena (UBT) भी नए सिरे से विचार कर रही है। बताया जा रहा है कि जैसे ही पवार का नाम गंभीरता से सामने आया, शिवसेना (यूबीटी) ने अपने कदम पीछे खींचने के संकेत दिए।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस और एनसीपी (शरद) के समर्थन के बिना शिवसेना (यूबीटी) का कोई उम्मीदवार जीत नहीं सकता। ऐसे में Uddhav Thackeray के सामने व्यावहारिक राजनीति को प्राथमिकता देने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं हैं।
क्या यह अंत का संकेत था?
डिप्टी सीएम Ajit Pawar के असामयिक निधन के बाद एनसीपी के दोनों धड़ों के संभावित विलय पर विराम लग गया था। उसी दौरान यह अटकलें भी तेज हुईं कि क्या यह शरद पवार की सक्रिय संसदीय राजनीति के अंत का संकेत है?
लेकिन पवार के राजनीतिक जीवन को देखें तो वह संघर्ष और वापसी की मिसाल रहा है। 1967 में बारामती से पहली बार विधानसभा चुनाव जीतने वाले 85 वर्षीय पवार पिछले करीब 60 वर्षों से लगातार किसी न किसी सदन के सदस्य रहे हैं।
उन्होंने तीन बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और कई बार केंद्र सरकार में मंत्री के रूप में जिम्मेदारी निभाई है। ऐसे में उनके समर्थक इसे “अनुभव की निरंतरता” का सवाल मानते हैं, न कि महज एक सीट की लड़ाई।
राज्यसभा की सीट का गणित
महाराष्ट्र में राज्यसभा की सात सीटों पर चुनाव होना है। संख्याबल के हिसाब से छह सीटें सत्तारूढ़ गठबंधन (राजग) के खाते में जाती दिख रही हैं। विपक्ष के पास सिर्फ एक सीट जीतने की संभावनाएं हैं — लेकिन शर्त है कि एमवीए पूरी तरह एकजुट रहे। एक सीट जीतने के लिए 37 विधायकों का समर्थन जरूरी है।
विधानसभा में एमवीए (एनसीपी, यूबीटी, कांग्रेस) के पास कुल 46 विधायकों का समर्थन है।
यदि कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (शरद) संयुक्त उम्मीदवार खड़ा करते हैं, तो यह सीट उनके पक्ष में जा सकती है। यही वजह है कि इस एक सीट पर रणनीति और सहमति बेहद अहम हो गई है।
एमवीए के लिए सियासी परीक्षा
यह चुनाव केवल एक सीट की लड़ाई नहीं है, बल्कि विपक्षी एकता की परीक्षा भी है। अगर एमवीए पवार के नाम पर सहमत हो जाता है, तो यह संदेश जाएगा कि गठबंधन व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर सामूहिक रणनीति को प्राथमिकता दे रहा है। वहीं, यदि मतभेद सामने आते हैं, तो यह विपक्ष की कमजोरी के रूप में देखा जाएगा।
अनुभवी चेहरे पर दांव
शरद पवार भारतीय राजनीति के उन नेताओं में रहे हैं जिन्होंने बदलते राजनीतिक दौर में भी अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी। उनके समर्थकों का कहना है कि संसद में उनका अनुभव विपक्ष की आवाज को मजबूत करेगा।
विरोधी भले इसे “पुराने चेहरे की वापसी” कहें, लेकिन सियासी गणित और गठबंधन की मजबूरी इस बार उनके पक्ष में जाती दिख रही है।
अब निगाहें एमवीए की औपचारिक घोषणा पर टिकी हैं। अगर सब कुछ तय संकेतों के मुताबिक हुआ, तो शरद पवार की संसदीय यात्रा का एक और अध्याय जल्द ही जुड़ सकता है।

