हर साल 11 अप्रैल को हम महात्मा ज्योतिबा फुले की जयंती मनाते हैं। लेकिन सच कहें तो यह सिर्फ एक औपचारिक दिन नहीं होना चाहिए, बल्कि यह दिन हमें उस सोच को याद दिलाने का मौका देता है जिसने समाज की जड़ें हिला दी थीं।

एक किसान परिवार से उठी क्रांति

ज्योतिबा फुले का जन्म एक साधारण माली (किसान) परिवार में हुआ था। उस समय समाज में जाति और छुआछूत का ऐसा जाल था कि निचली जाति के लोगों को इंसान तक नहीं समझा जाता था। लेकिन फुले जी ने इसी व्यवस्था को चुनौती देने की ठान ली।

ज्योतिबा
फुले जी एक महान समाज सुधारक

एक किस्सा जो सोच बदल देता है

कहा जाता है कि एक बार जब ज्योतिबा फुले अपने एक ब्राह्मण मित्र की शादी में गए, तो वहां मौजूद लोगों ने उनकी जाति जानकर उनका अपमान किया और उन्हें समारोह से निकाल दिया।

उस दिन की वह चोट उनके दिल में इतनी गहरी लगी कि उन्होंने ठान लिया—अब इस अन्याय के खिलाफ लड़ना ही जीवन का उद्देश्य होगा। यही वह मोड़ था जहां से एक आम इंसान समाज सुधारक बन गया।

महिलाओं की शिक्षा की शुरुआत

आज हम लड़कियों की पढ़ाई को सामान्य मानते हैं, लेकिन एक समय था जब इसे पाप समझा जाता था। ऐसे दौर में सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर ज्योतिबा फुले ने लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला।

सोचिए, उस समय उन्हें कितनी गालियां, पत्थर और अपमान सहना पड़ा होगा। सावित्रीबाई जब पढ़ाने जाती थीं, तो लोग उन पर कीचड़ फेंकते थे। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

समाज के लिए एक खुली लड़ाई

फुले जी ने सिर्फ शिक्षा तक ही खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने सती प्रथा, बाल विवाह और जाति भेदभाव के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई।

उन्होंने सत्यशोधक समाज की स्थापना की, जिसका उद्देश्य था—सत्य की खोज और समाज में समानता लाना।

इंसानियत सबसे बड़ी पहचान

फुले जी का मानना था कि इंसान की पहचान उसकी जाति या धर्म से नहीं, बल्कि उसके कर्म और इंसानियत से होती है।

उन्होंने हमेशा कहा कि जब तक समाज का आखिरी व्यक्ति आगे नहीं बढ़ेगा, तब तक असली विकास नहीं होगा।

आज के दौर में उनकी जरूरत क्यों?

आज हम 21वीं सदी में हैं, लेकिन क्या जाति भेदभाव और असमानता पूरी तरह खत्म हो गई है? शायद नहीं।
इसीलिए फुले जी की सोच आज भी उतनी ही जरूरी है।

उनकी जयंती हमें सिर्फ फूल चढ़ाने का मौका नहीं देती, बल्कि यह सोचने का अवसर देती है कि— क्या हम सच में बराबरी वाले समाज की ओर बढ़ रहे हैं?

महात्मा ज्योतिबा फुले : “अगर समाज बदलना है, तो सोच बदलनी होगी”

महात्मा ज्योतिबा फुले सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक सोच हैं—एक ऐसी सोच जो हर उस इंसान के लिए खड़ी होती है जिसे समाज ने कभी दबाने की कोशिश की। इस जयंती पर अगर हम उनके विचारों को अपने जीवन में थोड़ा भी उतार लें, तो यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

“अगर समाज बदलना है, तो सोच बदलनी होगी” — यही संदेश हमें ज्योतिबा फुले की जिंदगी से मिलता है।

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By Chandan Patel

चंदन पटेल AVN News से लंबे समय से जुड़े पत्रकार हैं। उन्होंने वर्ष 2020 से रिपोर्टर के रूप में पत्रकारिता की शुरुआत की और जमीनी स्तर की खबरों को प्रमुखता से उठाते हुए लगातार अपनी पहचान बनाई। वर्तमान में वे AVN News के एडिटर-इन-चीफ के रूप में समाचार संपादन, कवरेज और डिजिटल पत्रकारिता का नेतृत्व कर रहे हैं। राजनीति, खेल,स्थानीय मुद्दों, जनसमस्याओं, प्रशासनिक गतिविधियों और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी खबरों को तथ्यपरक और सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाना उनकी पत्रकारिता की प्रमुख विशेषता है। उनका उद्देश्य आम लोगों की आवाज को प्रमुखता देना और विश्वसनीय खबरों के माध्यम से समाज को जागरूक करना है।

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