देश में टीवी स्टूडियो की रोशनी हर शाम जगमगाती है। बहसें होती हैं, आवाज़ें ऊँची होती हैं, स्क्रीन कई हिस्सों में बंट जाती है। लेकिन सवाल वही है—क्या इन बहसों में आम आदमी की असली परेशानियों की जगह बची है?
रोज़गार, महंगाई और सरकार की नीतियों पर गंभीर चर्चा कितनी होती है? और जब देश के विपक्ष के नेता राहुल गांधी को जान से मारने की धमकी मिलती है, तो क्या वह भी एक लोकतांत्रिक देश में बेहद गंभीर मुद्दा नहीं होना चाहिए?
राहुल गांधी को धमकी: लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी
हाल ही में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को जान से मारने की धमकी मिलने की खबर सामने आई। किसी भी लोकतंत्र में यह सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि विचारों की असहमति पर हमला माना जाता है।
चाहे कोई उनके विचारों से सहमत हो या असहमत, लेकिन एक चुने हुए जनप्रतिनिधि को धमकी मिलना पूरे सिस्टम के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। सवाल यह है कि इस पर राष्ट्रीय स्तर पर कितनी गंभीर बहस हुई? क्या प्राइम टाइम पर इसे लोकतंत्र की सुरक्षा के मुद्दे के रूप में उठाया गया?

मीडिया की प्राथमिकताएँ: मुद्दे बनाम मसाला
आज देश में बेरोज़गारी दर को लेकर समय-समय पर बहस होती है। महंगाई की मार से हर घर प्रभावित है—रसोई गैस, पेट्रोल-डीजल, दाल-सब्ज़ी, स्कूल फीस… आम आदमी की कमाई वही, खर्च दोगुना। लेकिन टीवी डिबेट्स में अक्सर असली मुद्दों की जगह सनसनीखेज विषय छा जाते हैं। सोशल मीडिया पर ट्रेंड, बयानबाज़ी, या किसी छोटे विवाद को घंटों तक खींचा जाता है। क्या कारण है कि रोजगार सृजन की ठोस योजनाओं, MSME सेक्टर की हालत, या छोटे व्यापारियों की मुश्किलों पर लगातार, गहराई से चर्चा कम दिखती है? क्या TRP की दौड़ ने पत्रकारिता के मूल उद्देश्य को पीछे धकेल दिया है?
लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका क्यों ज़रूरी?
लोकतंत्र में सत्ता पक्ष जितना ज़रूरी है, उतना ही मजबूत विपक्ष भी। विपक्ष सवाल पूछता है, सरकार को जवाबदेह बनाता है, और जनता की आवाज़ संसद तक पहुंचाता है।
अगर विपक्ष के नेता को धमकी मिलती है और इस पर मीडिया की चुप्पी दिखती है, तो यह सिर्फ एक खबर की अनदेखी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संतुलन पर भी सवाल खड़े करता है। मीडिया को “चौथा स्तंभ” कहा जाता है। उसकी भूमिका सिर्फ सरकार की तारीफ करना या विरोधियों की आलोचना करना नहीं, बल्कि सच को सामने लाना और हर पक्ष से सवाल पूछना है।
आम आदमी की नज़र से
गाँव का किसान हो या शहर का नौकरीपेशा युवक—उसे इस बात से फर्क पड़ता है कि उसके घर की रसोई कैसे चलेगी, बच्चों की पढ़ाई कैसे होगी, और भविष्य सुरक्षित कैसे बनेगा।
जब मीडिया इन मुद्दों से ध्यान हटाकर दूसरी बहसों में उलझा रहता है, तो आम आदमी खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। उसे लगता है कि उसकी असली तकलीफें किसी के एजेंडे में नहीं हैं।
सवाल जो उठने ही चाहिए
- क्या मीडिया की प्राथमिकताएँ बदल चुकी हैं?
- क्या रोजगार और महंगाई जैसे मुद्दे “टीआरपी फ्रेंडली” नहीं रहे?
- क्या लोकतांत्रिक असहमति को दबाने वाली घटनाओं पर राष्ट्रीय चर्चा नहीं होनी चाहिए?
इन सवालों का जवाब सिर्फ मीडिया या सरकार को नहीं, बल्कि हम सबको मिलकर ढूँढना होगा। क्योंकि लोकतंत्र में मीडिया की चुप्पी भी उतनी ही मायने रखती है जितनी उसकी आवाज़।
देश में बहस की दिशा बदलनी होगी
देश की ताकत उसकी जनता है। जनता की ताकत उसकी आवाज़ है। और उस आवाज़ को मंच देने की जिम्मेदारी मीडिया की है। अगर रोजगार, महंगाई, और लोकतांत्रिक मूल्यों पर खुलकर चर्चा नहीं होगी, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे खोखला होता जाएगा। समय आ गया है कि बहस की दिशा बदले—स्टूडियो की चमक से निकलकर ज़मीन की हकीकत तक पहुंचे। क्योंकि सवाल सिर्फ एक नेता या एक पार्टी का नहीं, बल्कि पूरे देश के भविष्य का है।
