क्या हम आजाद है? 15 अगस्त 1947 — वो तारीख जब हमने अंग्रेज़ों की गुलामी की जंजीरें तोड़ दीं। हमने सोचा था कि अब गरीबी मिटेगी, जात-पात का भेद खत्म होगा, और हर महिला को बराबरी और सम्मान मिलेगा। लेकिन आज, जब हम 79वें साल की ओर बढ़ रहे हैं, एक कड़वा सवाल गूंजता है — क्या हम सच में आज़ाद हैं?
गरीबी — आज भी जकड़न में
आज़ादी के वक्त भारत गरीब था, और आज भी हमारे देश के करोड़ों लोग दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहे हैं। सरकारी आंकड़े भले ही गरीबी की रेखा से ऊपर उठे लोगों की संख्या दिखाएं, लेकिन ज़मीन पर सच अलग है। गांवों में किसान कर्ज़ के बोझ तले आत्महत्या कर रहे हैं, शहरों में मज़दूर दिन-रात खटकर भी पेट भर खाना और बच्चों की पढ़ाई का खर्च नहीं उठा पा रहे। क्या यही आज़ादी थी जिसके लिए हमारे शहीदों ने जान दी थी?
जात-पात — आज भी दीवार खड़ी है
हमने संविधान में बराबरी का अधिकार लिखा, लेकिन समाज में जात-पात का ज़हर अब भी फैला है। आज भी शादी-ब्याह जात देखकर होते हैं, गांवों में दलितों को मंदिर में प्रवेश तक नहीं मिलता, और ऊँच-नीच की सोच ने रिश्तों में खाई खोदी हुई है। यहां तक कि राजनीति भी जातीय समीकरणों में उलझी हुई है।
महिलाओं की स्थिति — क्या मिला उन्हें सम्मान?
आज़ादी के 78 साल बाद भी महिलाएं अपने हक के लिए लड़ रही हैं। बेटियां आज भी भ्रूण में मारी जा रही हैं, दहेज की बलि चढ़ रही हैं, और सड़कों पर असुरक्षित महसूस कर रही हैं। शिक्षा और नौकरी में महिलाएं आगे बढ़ रही हैं, लेकिन मानसिकता का बदलाव धीमा है। अगर महिला सुरक्षित नहीं है, तो देश कितना भी आगे बढ़ जाए, अधूरा ही रहेगा।

अंग्रेज़ों से आज़ादी तो मिल गई लेकिन असली आज़ादी — कब मिलेगी?
असली आज़ादी तब होगी जब देश का हर नागरिक पेट भर खाएगा, बिना डर के अपनी बात कह सकेगा, और इंसान को इंसान समझा जाएगा, न कि जात-पात या धर्म के आधार पर। असली आज़ादी तब होगी जब हर लड़की खुली हवा में, बेखौफ चल सकेगी।
आज, तिरंगा लहराते वक्त हमें गर्व होना चाहिए, लेकिन साथ ही हमें अपनी कमियों को भी स्वीकारना होगा। हमारे शहीदों ने हमें अंग्रेज़ों से आज़ादी दिलाई, अब हमें गरीबी, भेदभाव, भ्रष्टाचार और मानसिक गुलामी से खुद को आज़ाद कराना होगा।
क्योंकि सवाल अभी भी वही है —
हम 79वें साल में हैं, लेकिन क्या हम सच में आज़ाद हैं?
