वट सावित्री व्रत क्या है, यह व्रत कब मनाया जाता है और इसके पीछे की कहानी क्या है?..
वट सावित्री व्रत क्या है?
वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म में विवाहित महिलाओं द्वारा रखा जाने वाला एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण व्रत है। यह व्रत पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए किया जाता है। भारत के कई राज्यों, विशेषकर बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में यह व्रत बड़ी श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है।
इस व्रत में महिलाएँ वट वृक्ष (बरगद के पेड़) की पूजा करती हैं और माता सावित्री तथा सत्यवान की कथा सुनती हैं। माना जाता है कि सावित्री ने अपने तप, बुद्धि और पतिव्रता धर्म के बल पर अपने मृत पति सत्यवान को यमराज से वापस प्राप्त किया था।
वट सावित्री व्रत कब मनाया जाता है?
यह व्रत अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तिथियों पर मनाया जाता है—
- उत्तर भारत में: ज्येष्ठ अमावस्या को
- महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में: ज्येष्ठ पूर्णिमा को
साल 2026 में यह व्रत ज्येष्ठ अमावस्या यानि कि 16 मई, शनिवार के दिन मनाया जा रहा है।
“वट” शब्द का अर्थ
“वट” का अर्थ है बरगद का पेड़। हिंदू धर्म में बरगद को अमरता, स्थिरता और दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है। इसकी जड़ें और शाखाएँ जीवन की निरंतरता को दर्शाती हैं।
इसलिए इस दिन महिलाएँ वट वृक्ष की पूजा करती हैं और उसके चारों ओर धागा लपेटती हैं।
वट सावित्री व्रत क्यों किया जाता है?
इस व्रत का मुख्य उद्देश्य है—
- पति की लंबी आयु की कामना
- वैवाहिक जीवन में सुख-शांति
- परिवार की समृद्धि
- अखंड सौभाग्य प्राप्त करना
- संतान और परिवार की रक्षा
हिंदू मान्यता के अनुसार, यह व्रत स्त्री के तप, समर्पण और प्रेम का प्रतीक है।

वट सावित्री व्रत की पौराणिक कथा
सावित्री और सत्यवान की कहानी
प्राचीन समय में मद्र देश के राजा अश्वपति की कोई संतान नहीं थी। उन्होंने कठोर तपस्या करके देवी सावित्री की आराधना की। देवी के आशीर्वाद से उनके घर एक कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम रखा गया — सावित्री।
सावित्री अत्यंत सुंदर, बुद्धिमान और तेजस्वी थीं। विवाह योग्य होने पर उन्होंने स्वयं अपने पति का चयन किया। उन्होंने वन में रहने वाले एक राजकुमार सत्यवान को अपना पति चुना।
लेकिन जब ऋषियों ने सत्यवान के बारे में बताया, तो ज्ञात हुआ कि उसकी आयु बहुत कम है और विवाह के एक वर्ष बाद उसकी मृत्यु निश्चित है।
राजा अश्वपति चिंतित हुए और सावित्री को समझाने लगे, लेकिन सावित्री ने कहा—
“मैं एक बार जिसे पति मान लेती हूँ, उसे कभी नहीं बदल सकती।”
इसके बाद सावित्री और सत्यवान का विवाह हो गया।
यह भी पढ़े: शिव क्या है? – भगवान शिव पर पूर्ण विवरणात्मक Descriptive जानकारी..
सत्यवान की मृत्यु
विवाह के ठीक एक वर्ष बाद वह दिन आया, जब सत्यवान की मृत्यु निश्चित थी। सत्यवान लकड़ी काटने जंगल गए और सावित्री भी उनके साथ गईं।
काम करते समय सत्यवान अचानक बेहोश होकर गिर पड़े। तभी यमराज उनके प्राण लेने आए।
सावित्री यमराज के पीछे-पीछे चलने लगीं। यमराज ने उन्हें वापस लौटने को कहा, लेकिन सावित्री अपने पति के प्रति समर्पण और धर्म की बातें करती रहीं।
उनकी बुद्धिमत्ता और पतिव्रता धर्म से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें कई वरदान दिए।
सावित्री की बुद्धिमानी
यमराज ने कहा कि वह कोई भी वरदान मांग सकती हैं, लेकिन सत्यवान का जीवन नहीं।
सावित्री ने पहले अपने ससुर की दृष्टि और राज्य वापस माँगा, फिर अपने पिता के लिए सौ पुत्रों का वरदान माँगा।
अंत में उन्होंने स्वयं के लिए भी सौ पुत्रों का वरदान माँग लिया।
तब यमराज समझ गए कि बिना सत्यवान के जीवित हुए यह संभव नहीं है। सावित्री की बुद्धिमानी और निष्ठा से प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान को पुनर्जीवन दे दिया।
इस प्रकार सावित्री ने अपने पति को मृत्यु से वापस प्राप्त किया।

वट सावित्री व्रत की पूजा विधि
पूजा की तैयारी
महिलाएँ सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं। कई महिलाएँ सुहाग की वस्तुएँ पहनती हैं जैसे—
- सिंदूर
- चूड़ियाँ
- बिंदी
- मंगलसूत्र
पूजा सामग्री
- वट (बरगद) वृक्ष
- जल
- रोली और अक्षत
- फूल
- धूप-दीप
- कच्चा सूत
- फल और मिठाई
- भीगा हुआ चना
- पंखा
- लाल कपड़ा
पूजा प्रक्रिया
- वट वृक्ष के पास जाकर जल अर्पित किया जाता है।
- वृक्ष की पूजा कर रोली, चावल और फूल चढ़ाए जाते हैं।
- कच्चे सूत को पेड़ के चारों ओर लपेटते हुए परिक्रमा की जाती है।
- सावित्री-सत्यवान की कथा सुनी जाती है।
- पति की लंबी आयु की प्रार्थना की जाती है।
- ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को दान दिया जाता है।
वट वृक्ष का धार्मिक महत्व
बरगद का वृक्ष को हिंदू धर्म में त्रिदेवों का प्रतीक माना जाता है—
- जड़ में ब्रह्मा
- तने में विष्णु
- शाखाओं में भगवान शिव का वास माना जाता है।
बरगद का वृक्ष लंबे समय तक जीवित रहता है, इसलिए इसे अमरता और स्थिर वैवाहिक जीवन का प्रतीक माना गया है।
व्रत के नियम
- कई महिलाएँ निर्जला उपवास रखती हैं।
- कुछ महिलाएँ फलाहार करती हैं।
- पूजा से पहले अन्न ग्रहण नहीं किया जाता।
- सत्य और संयम का पालन किया जाता है।
आधुनिक समय में वट सावित्री व्रत का महत्व
आज के समय में यह व्रत केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
यह व्रत भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति, धैर्य और परिवार के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
निष्कर्ष
वट सावित्री व्रत भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। सावित्री की कथा हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम, निष्ठा, बुद्धिमत्ता और दृढ़ संकल्प किसी भी कठिनाई को पराजित कर सकता है।
यह व्रत केवल पति की लंबी आयु की कामना नहीं, बल्कि परिवार, रिश्तों और वैवाहिक जीवन की पवित्रता का उत्सव भी है।
यह भी पढ़े: 12 Jyotirlings of Lord Shiva : जानिए भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग के बारे मे..
Note :-
Disclaimer: यह आर्टिकल व लेख केवल सूचना के उद्देश्यों के लिए है। यह जानकारी सोर्स पर आधारित है। यह आर्टिकल व लेख में हमारे द्वारा बताए गई जानकारी किसी भी त्रुटि या चूक के लिए आर्टिकल और प्रकाशक जिम्मेदार नहीं हैं।
| हमें उम्मीद है की आपको यह आर्टिकल व लेख “! “वट सावित्री व्रत क्या है, यह व्रत कब मनाया जाता है और इसके पीछे की कहानी क्या है?…. !” जरुर पसंद आई होगी। हमारी हमेशा से यही कोशिश रहती है की रीडर को पूरी सही जानकारी प्रदान की जाये।
!!अगर आपको आर्टिकल अच्छा लगा हो तो इसे आपने सोशल मीडिया पर जरूर शेयर करें। इस आलेख को पढ़ने के लिए धन्यवाद। avnnews.in में दोबारा विजिट करते रहें…..!!
By: KP
Edited by: KP
