उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा, सेक्टर-150 से सामने आई यह घटना सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर एक गहरा सवाल है, जो समय रहते चेतावनी देने, सुरक्षा देने और जीवन बचाने में नाकाम रहा। पानी से भरी सड़क, अंधेरा, कोई संकेत नहीं… और उसी खामोशी में एक होनहार सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता अपनी कार समेत डूब गया। उसकी सांसें पानी में घुलती रहीं और सिस्टम सोता रहा। यह दृश्य किसी एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि हर उस आम नागरिक का डर है जो रोज़ विकास के नाम पर बनी सड़कों से गुजरता है।

उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री का हस्तक्षेप, लेकिन सवाल अब भी जिंदा

हादसे की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तत्काल हस्तक्षेप किया। तीन सदस्यीय विशेष जांच टीम (SIT) का गठन कर पांच दिनों में रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए। यह कदम जरूरी था, क्योंकि सवाल सिर्फ हादसे का नहीं, बल्कि जवाबदेही का है।

एसआईटी का नेतृत्व एडीजी जोन मेरठ करेंगे। उनके साथ मंडलायुक्त मेरठ और पीडब्ल्यूडी के चीफ इंजीनियर शामिल हैं। टीम यह जांच करेगी कि जलभराव इतना भयावह क्यों हुआ?
सड़क और अंडरपास की डिजाइन व गुणवत्ता कैसी थी?
चेतावनी बोर्ड और बैरिकेड्स क्यों नहीं थे?
आपात स्थिति में मदद क्यों नहीं पहुंची?
सीईओ हटाए गए, लेकिन क्या यही काफी है?

मुख्यमंत्री ने नोएडा प्राधिकरण के सीईओ लोकेश एम को पद से हटा दिया।

यह फैसला प्रशासनिक सख्ती का संकेत जरूर देता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ एक अधिकारी हटाने से सिस्टम सुधर जाएगा? या फिर यह कार्रवाई भी वक्त के साथ फाइलों में दब जाएगी?

सूत्रों के अनुसार सीएम ने साफ कहा है कि जांच में दोषी पाए जाने वाले हर अधिकारी और कर्मचारी पर सख्त कार्रवाई होगी। यही उम्मीद अब जनता को थामे हुए है।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने दिल दहला दिया

युवराज मेहता की पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने इस हादसे की भयावहता को और गहरा कर दिया। डॉक्टरों के मुताबिक, उनके फेफड़ों में करीब 3.5 लीटर पानी भरा हुआ था। इसका मतलब साफ है—युवराज तुरंत नहीं मरे, वे काफी देर तक जिंदगी और मौत के बीच जूझते रहे। पानी में फंसी कार, घुटती सांसें, मदद की कोई किरण नहीं… और अंत में दम घुटने से मौत।

लंबे समय तक पानी में रहने के कारण ऑक्सीजन की आपूर्ति रुक गई और अत्यधिक दबाव से हार्ट फेलियर हुआ। यह केवल मेडिकल रिपोर्ट नहीं, बल्कि सिस्टम की असफलता की गवाही है।

विकास बनाम सुरक्षा: किसकी जिम्मेदारी?

ग्रेटर नोएडा जैसे आधुनिक शहर में अगर बारिश के बाद सड़कें मौत का जाल बन जाएं, तो विकास के दावे खोखले लगते हैं। यह हादसा पूछता है—क्या हमारी योजनाओं में इंसानी जान की कीमत सबसे आख़िर में आती है?

युवराज मेहता अब लौटकर नहीं आएंगे। उनके परिवार के लिए यह जिंदगी भर का जख्म है। लेकिन अगर इस मौत से सबक नहीं लिया गया, तो अगली खबर किसी और नाम के साथ होगी।

अब जरूरत है सिर्फ जांच की नहीं, बल्कि ईमानदार जवाबदेही और स्थायी समाधान की, ताकि कोई और युवा का सपना यूं पानी में न डूबे।

नोएडा

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