वृंदावन और मथुरा में जन्माष्टमी कैसे मनाई जाती है?
नीचे आपको वृंदावन (Veerandhavan) और मथुरा (Mathura) में कृष्ण जन्माष्टमी (Janmashtami) का पर्व कैसे उत्साह और भक्ति-भाव से मनाया जाता है, वृंदावन और मथुरा—जिन्हें कृष्ण की जन्मभूमि और बाल लीला की धरती माना जाता है—में जन्माष्टमी के दृश्य अनुभव कर सकते हैं। संकेत मिल रहे हैं: झांकियाँ, मंदिरों की सजावट, मटकी फोड़ (दही‑हांडी) जैसा उत्साहपूर्ण आयोजन।
वृंदावन में जन्माष्टमी कैसे मनाई जाती है?
1. भव्य मंदिर सजावट और झूलनोत्सव
वृंदावन के सभी प्रमुख मंदिर—जैसे बांके बिहारी, इस्कॉन, राधा रमण आदि—फूलों, रंगोली, रोशनी और झूला (झूलनोत्सव) से सुंदर रूप में सजाए जाते हैं। भक्त कृष्ण की जन्मलीला और बाल लीलाओं को झूले में झुलाकर स्मरण करते हैं।
2. रसलीला, झांकियाँ और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ
रासलीला—जिसमें कृष्ण-राधा की लीला नाटकीय रूप से मंचित होती है—कुछ दिनों पहले से ही शहर के विभिन्न पवित्र स्थानों पर आयोजित होती हैं। साथ ही झांकियाँ (जीवन की विभिन्न लीलाओं पर आधारित दृश्यावलियाँ) सजाई जाती हैं।
3. दही‑हांडी या मटकी फोड़
वृंदावन में युवा “Govindas” ऊँचे लटके मटकों को तोड़ने के लिए मानव-पिरामिड बनाते हैं—यह कृष्ण की मक्खन-चोरी लीला का जश्न है और अत्यंत जीवंत एवं उत्साहपूर्ण आयोजनों में से एक है।
4. मध्यरात्रि का अभिषेक और आरती
जिस पवित्र समय (मध्यरात्रि) को कृष्ण के जन्म का माना जाता है, उस समय विशेष अभिषेक (दूध, दही, शहद, घी से) और आरती करनी होती है। 56‑भोग (चप्पन भोग) प्रसाद भक्तों में वितरित किये जाते हैं।
5. नंदोत्सव (दूसरा दिन)
जन्माष्टमी के अगले दिन—नंदोत्सव के रूप में—नंदगाँव में प्रसाद वितरण, खेल, और उत्सव होते हैं, जब नंद बाबा ने लोगों में प्रसन्नता बाँटी थी।
6. संगीत, कीर्तन, प्रवचन और सामूहिक भक्ति
पूरे शहर में भजन, कीर्तन, प्रवचन और श्रीमद्भागवतम् पाठ होते हैं—इनमें स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय भक्त शामिल होते हैं।
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मथुरा में जन्माष्टमी कैसे मनाई जाती है?
1. कृष्ण जन्मभूमि और अन्य प्रमुख मंदिर
मथुरा का कृष्ण जन्मभूमि मंदिर इस उत्सव का केंद्र स्थान है, जहाँ मध्यरात्रि पर विशेष अभिषेक, भक्तिमय आरती और पठानियाँ आयोजित होती हैं।
2. झांकियाँ, झूलनोत्सव और शोभा यात्रा
मथुरा में झांकी सजाकर विभिन्न लीला दृश्य दिखाए जाते हैं; झूला सजाकर नन्हें कृष्ण की बाल लीलाओं को स्मरण किया जाता है; शोभा यात्रा धूमधाम से निकलती है। मंदिर और गलियाँ रंगीन रोशनी और रंगोली से सजी होती हैं।
3. मध्यरात्रि अभिषेक, भजन और प्रसाद वितरण
मथुरा के सभी मंदिरों में “मध्यरात्रि का जन्मोत्सव” अभिषेक, कीर्तन व भजन के साथ मनाया जाता है। भक्त 56‑भोग द्वारा प्रसाद ग्रहण करते हैं।
4. धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन
पूर्ण गांव और मंदिर परिसर भजन, प्रवचन, नृत्य-नाट्य और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों से गूँजते हैं। भक्तों में गहरे भक्ति भाव का संचार होता है।
निष्कर्ष :
दोनों ही जगहों पर जन्माष्टमी राष्ट्रीय‑आध्यात्मिक एकता और भक्ति का अमूल्य प्रतीक बनकर उभरता है—जहाँ कृष्ण की लीला, भक्ति, कला और सांस्कृतिक सौंदर्य एक साथ मिलते हैं।
“आप सभी देहवासियों को ‘एवीएन परिवार’ की ओर से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
जय श्रीकृष्ण!”
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Note:
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