भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां हर चुनाव में जनता सपनों और उम्मीदों का बोझ नेताओं के कंधों पर डाल देती है। कोई रोजगार की आस लगाता है, कोई शिक्षा और अस्पताल की, तो कोई किसान हित की। लेकिन चुनाव बीतने के बाद वही जनता अपनी समस्याओं के साथ अकेली पड़ जाती है। सरकार चाहकर भी हर मुद्दे का हल नहीं निकाल पाती और जनता को सरकार बेबस दिखती है।

बेरोज़गारी: युवाओं की टूटी उम्मीदें

देश में करोड़ों युवा डिग्री लिए नौकरी की तलाश में यहां वहां भटक रहे हैं। सरकारी नौकरियों की परीक्षाएं सालों तक लटकती रहती हैं, कभी पेपर लीक तो कभी रिज़ल्ट रुका रहता है। युवा सवाल करता है – “हम मेहनत करें, डिग्री लें, फिर भी हमें रोजगार क्यों नहीं?” यही सवाल सरकार को कमज़ोर और लाचार दिखाता है। अप्रैल 2025 में, भारत में बेरोज़गारी दर 5.1% पर पहुंची, जो पहले की तुलना में बेहतर स्थिति दिखाती है । (The Times of India)

लेकिन मई और जून में यह फिर बढ़कर 5.6% हो गई—युवा बेरोज़गारी खासतौर पर चिंताजनक: शहरों में 15–29 वर्ष आयु वर्ग में यह दर 18–19%, और ग्रामीण क्षेत्रों में 13–14% तक पहुंच चुकी है (The Economic Times)

जुलाई में हालांकि यह दर फिर गिरकर 5.2% हो गई, लेकिन विशेषज्ञों में इस डेटा की सटीकता को लेकर सवाल बने हुए हैं ।(The Economic Times)

“मेहनत–कुशल युवा बेरोज़ार, उम्मीदों का हाथ टूटता हुआ”—इन्हीं आँकड़ों के बीच जनता को लगता है कि सरकार मजबूर है।

भारत में किसान का दर्द और सरकार की चुप्पी

भारत का अन्नदाता आज सबसे बड़ी मुसीबत में है। कर्ज़ के बोझ से दबे किसान आत्महत्या तक करने को मजबूर हैं। कभी बाढ़ तो कभी सूखा उनकी मेहनत को बर्बाद कर देता है, ऊपर से फसल का सही दाम भी नहीं मिलता। मंचों से किसान हित की बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन ज़मीन पर किसान आज भी बेबस है।

भारत
किसान का दर्द और सरकार की चुप्पी

किसान आत्महत्या: आँकड़े जो दिल झकझोर दें

पूरे भारत में 2022 में 11,290 (किसान + कृषि मजदूर) आत्महत्याएँ हुईं—जो कुल आत्महत्याओं का 6.6% था ।

महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में जनवरी–जून 2025 के पहले छह महीनों में किसान आत्महत्याओं की संख्या बढ़कर 520 हो गई—जो 2024 की इसी अवधि (430) से लगभग 20% ज़्यादा है (The Times of India)

भारत
किसान का आत्महत्या का दर्द

हालिया आदिवासी किसानों की खुदकुशी की खबरों ने दर्द को और बढ़ा दिया—एक किसान के आत्महत्या के बाद उसकी माँ की भी दिल का दौरा लगने से मौत हो गई
(The Times of India)

हालाँकि, पूरे 2025–26 के आंकड़े NCRB द्वारा अभी तक जारी नहीं हुए हैं (Global Agriculture)

कर्ज़, फसल खराबी, मानसून की अनिश्चितता—ये किसान की ज़िंदगी चीर जाते हैं। इन आँकड़ों से साफ़ पता चलता है कि सरकार कितनी असहाय नजर आती है।

महंगाई ने तोड़ी आम जनता की कमर

पेट्रोल, डीज़ल, गैस सिलेंडर, दवाइयां और रोज़मर्रा की ज़रूरतें – सब महंगी होती जा रही हैं। गरीब और मध्यम वर्ग अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा सिर्फ घर चलाने में ही खर्च कर देता है। जब जनता राहत चाहती है और सरकार सिर्फ़ वादे दोहराती है, तो जनता के दिल से यही आवाज़ उठती है – “सरकार है, लेकिन मदद करने में बेबस है।”

भारत

महंगाई: राहत या धोखा?

मई 2025 में खुदरा महंगाई दर 2.82% रही, जो छह साल की सबसे निचली दर थी ।

जून में CPI आधारित मुद्रास्फीति 2.10% (ग्रामीण: 1.72%, शहरी: 2.56%) और WPI का फ़ूड इंडेक्स -0.26% दर्ज हुआ—यानी थोक स्तर पर भी कीमतें गिर रही थीं । (DD News)

जुलाई में खुदरा महंगाई और भी घटी—महंगी सब्ज़ियों की कीमतें 20% से अधिक बैठ गईं—यह आठ साल का सबसे निचला स्तर था

रोजमर्रा की चीज

राशन, सब्ज़ी, गैस—हर रोज़ की ज़रूरतों पर राहत तो मिली, लेकिन किसान की आमदनी में गिरावट सरकार की कमजोरी की ओर इशारा करती है।

राजनीति का खेल और असली मुद्दे

भारत में सबसे बड़ी समस्या राजनीति की जटिलता है। सत्ता में बने रहना और विपक्ष को हराना ही नेताओं की प्राथमिकता बन जाता है। बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और महंगाई जैसे मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। यही वजह है कि आम जनता को सरकार मजबूर और बेबस नज़र आती है।

राष्ट्रीय धरोहरों पर भरोसा: क्या कमीबेशी?

इन आँकड़ों से स्पष्ट है:

बेरोज़गारों को रोज़गार चाहिए, लेकिन दरख़्वास्त और नीति-निर्धारण में देरी से विश्वास टूट रहा है।

महंगाई में कमी से थोड़ी राहत मिली, लेकिन किसानों की दुर्दशा पर यह असर नहीं हो पाया।

आत्महत्या के आँकड़े सरकार के संवेदनशील और त्वरित कार्रवाई करने की ज़रूरत को उजागर करते हैं।

भारत सरकार के नीतियां सिर्फ कागज़ों से निकलकर ज़मीन पर उतरें।

भारत सरकार के पास ताक़त भी है और साधन भी, लेकिन जनता का विश्वास तभी मिलेगा जब नीतियां सिर्फ कागज़ों से निकलकर ज़मीन पर उतरें। जब बेरोज़गार को नौकरी मिले, किसान को फसल का दाम और आम आदमी को राहत, तभी सरकार मज़बूत दिखेगी। वरना जनता के दिल में हमेशा यही सवाल रहेगा –

“इतनी बड़ी सरकार होकर भी, क्यों लगती है बेबस?”

देश दुनिया की खबरों की अपडेट के लिए AVN News पर बने रहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *