बिहार का मुख्यमंत्री सिर्फ लालू का बेटा ही क्यों बने? कोई और क्यों नहीं?
यह सवाल आज हर उस बिहारी के दिल में उठ रहा है, जो अपने राज्य में असली बदलाव देखना चाहते है। लालू प्रसाद यादव ने बिहार की राजनीति में लंबा समय बिताया। उनके बेटे तेजस्वी यादव भी आज राजनीति में एक बड़ा चेहरा हैं। बिहार की राजनीति में एक सवाल बार-बार उठता है, लेकिन क्या मुख्यमंत्री की कुर्सी किसी एक परिवार की विरासत व जागीर बनकर रह जाएगी?, क्या लोकतंत्र में नेतृत्व का अधिकार केवल वंशजों को ही मिलेगा?
तेजस्वी यादव, लालू प्रसाद यादव के बेटे हैं। उनके मुख्यमंत्री बनने या बनने की चर्चा हमेशा इस वजह से गर्म रहती है कि वे एक बड़े राजनीतिक घराने से आते हैं। लेकिन क्या राजनीति में सिर्फ वंश होना ही योग्यता है?, बिहार जैसे ज्ञानि राज्य में, जहाँ चंद्रगुप्त और चाणक्य जैसे नेता हुए, वहाँ आज भी हम नेता चुनते समय वंश को प्राथमिकता क्यों दे रहे हैं? क्या हमारे राज्य में तेजस्वी यादव से ज़्यादा योग्य, मेहनती और नीतिवान युवा नहीं हैं? यह सवाल केवल तेजस्वी या लालू यादव पर नहीं, पूरे सिस्टम पर है। अगर लोकतंत्र में सत्ता जनता की है, तो निर्णय भी जनता का होना चाहिए किसी परिवार का नहीं।
बिहार के नागरिक को ये सोचना होगा:
- क्या हम योग्यता को देख रहे हैं या सिर्फ सरनेम को?
- क्या नया बिहार सिर्फ पुराने नेताओं के बेटे-बेटियों से ही बनेगा?
- क्या युवाओं को राजनीति में स्थान केवल तब मिलेगा जब वे किसी राजनीतिक खानदान से हों?
- अब समय आ गया है कि हम बदलाव की बात न केवल करें, बल्कि उसे लागू भी करें।
- बिहार का मुख्यमंत्री वो बने, जो सच में जनता की सेवा कर सके — चाहे वो किसी किसान का बेटा हो, किसी शिक्षक की बेटी हो, या किसी आम नागरिक का प्रतिनिधि।
- राजनीति अब विरासत नहीं, ज़िम्मेदारी बननी चाहिए।
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आइए कुछ जरूरी सवाल उठाएँ:
- क्या तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बनने के लिए सबसे योग्य हैं, या सिर्फ इसलिए योग्य माने जा रहे हैं क्योंकि वो लालू यादव के बेटे हैं?
- बिहार जैसे विशाल और शिक्षित राज्य में क्या कोई और योग्य नेता नहीं है, जो बेहतर सोच, नई ऊर्जा और साफ़ नीयत के साथ नेतृत्व कर सके?
- क्या आम जनता के बेटे-बेटियाँ, जो ज़मीनी स्तर पर काम कर रहे हैं, उन्हें कभी मौका मिलेगा?
वंशवाद बनाम लोकतंत्र:
भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहाँ नेता जनता के बीच से चुना जाता है, किसी राजघराने या परिवार से नहीं। लेकिन अफ़सोस की बात है कि आज की राजनीति में वंशवाद एक आम चलन बन गया है। खासकर बिहार में, जहाँ नेता का बेटा ही नेता बनता जा रहा है।
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ज़रूरत है बदलाव की सोच की:
बिहार को ऐसे नेता की ज़रूरत है:
- जो ज़मीन से जुड़ा हो
- जो जनता की समस्याएँ समझे
- जिसकी राजनीति सेवा-भाव पर आधारित हो, सत्ता-लालच पर नहीं
- जो अपने दम पर ऊपर आया हो, न कि पिता की कुर्सी पर बैठने के लिए तैयार हुआ हो
निष्कर्ष:
बिहार का मुख्यमंत्री कोई भी बन सकता हैं — अगर वे अपने काम, विचार और नेतृत्व क्षमता से जनता का भरोसा जीतें।
लेकिन सवाल ये है — क्या मौका सिर्फ उन्हें ही मिलेगा? या आम जनता के बीच से भी कोई ऊपर उठ पाएगा?
अब वक्त है सवाल पूछने का, सोच बदलने का और सही नेता चुनने का।
क्योंकि बिहार सिर्फ किसी का “पारिवारिक प्रॉपर्टी” नहीं, बल्कि 12 करोड़ जनता की उम्मीद है।
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Note:
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