Poetry : शायद ज़िंदगी का वो था ही नहीं.. सिर्फ़ पंखा जानता है, बोझ जिस्म का..

शायद ज़िंदगी का वो था ही नहीं.. सिर्फ़ पंखा जानता है, बोझ जिस्म का शायद ज़िंदगी का वो था ही नहीं.. सिर्फ़ पंखा जानता है, बोझ जिस्म का था ही नहीं,  वो जो लटक गया था, शायद ज़िंदगी का था ही नहीं।  सबने हँसते चेहरे को समझा जीता-जागता,  क्या ख़बर कि अंदर कोई ज़िंदा था … Continue reading Poetry : शायद ज़िंदगी का वो था ही नहीं.. सिर्फ़ पंखा जानता है, बोझ जिस्म का..